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रमजान

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इन्सानियत भरी दिलोंसे निकली
सूनलो भाई अजान
इन्सान को इंन्सान समझाना
यही तो है रमजान…ll धृ ll

ताक लिया जब चांद जमिंसे
रमजान की लहरे आइ खुशिसे
इन लहरों पे संवार होकर
भाईचारा बनाना जान
इंन्सान को इन्सान समझना
यही तो है रमजान…ll 1 ll

हर रोज रखा एक पवित्र रोजा
इन्सांन को मिलने अब तू खोजा
इस काम में भाई खोया गर तू
इफ्तार का वो खानपान
इन्सांन को इन्सांन समझना
यही तो है रमजान…ll 2 ll

मजलूमो पे वार न करना
मजलूमो की हार न करना
याद सदा कर इन बातों को
पाक है ये आनबान
इन्सांन को इन्सांन समझना
यही तो है रमजान…ll 3 ll
:
सुंदरता का आंख मे सुरमा
खान पिने मिठा शिरखुर्मा
आंख मे छलके प्यार सभी के
मिठी हो अपनी जुबान
इन्सांन को इन्सांन समझना
यही तो है रमजान… II4II…

देख अंधेरा बढ रहा है
तू खाली नमाज पढ रहा है
पढ नमाज के ऐसा बने उजाला
अंधेरा हो बेजान
इन्सांन को इन्सांन समझना
यही तो है रमजान…ll 5 ll

✒️कवी:-सुधाकर लोमटे(उमरखेड)

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